Social Media

Sunday, January 24, 2021

एक महान प्रेम कथा

प्रेम हो तो माँ एमिली शेंकल जैसा उन्होंने नेताजी बोस से प्रेम किया उनकी जीवनसंगिनी बनीं किन्तु नेताजी बोस के लक्ष्य के बीच कभी रुकावट नहीं बनीं अपितु वह नेताजी बोस की प्रेरणा बनीं नेताजी बोस की यादों के सहारे अपना पूरा जीवन जीने वाली महान नारी एमिली शेंकल जी को भारत में कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह स्वाभाविक अधिकारिणी थीं 
देश को नेहरू और एडविना की अय्याशी के विषय में तो पता है किंतु नेताजी बोस और माँ एमिली शेंकल की अमर प्रेम कहानी के विषय में कुछ ज्ञात नहीं । 

युवाओं के लिए आज प्रेम का अभिप्राय केवल दैहिक आकर्षण से है काश की देश का युवा प्रेरणा लेता नेताजी बोस से देश का युवा प्रेरणा लेता माँ एमिली शेंकल से । 

राष्ट्रपिता नेताजी बोस और माँ ऐमिली शेंकल के अमर प्रेम को मेरा प्रणाम 🙏🙏🙏🙏🙏

Saturday, January 16, 2021

किसान आंदोलन के पीछे की हकीकत

आज मैं अथर्ववेद और यजुर्वेद पढ़ रहा था, वहाँ भूमि सूक्त और कृषि सूक्त के कुछ मंत्रों पर नजर गई, जिसका विश्लेषण आज के लेख में कर रहा हूँ।...

वैदिक काल के किसानों में राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई थी। 
पृथ्वी सूक्त के एक मंत्र में किसान कहता है – 
"यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोंहतु। 
मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्। 
अर्थ – हे मातृभूमि ! हम तेरे जिस स्थान को भी खोदें, उसकी उर्वरा शक्ति नष्ट न हो बल्कि उसकी उपजाऊ शक्ति शीघ्र विकसित हो जाए।
हे अनवेषणीय माँ तन-मन तुम्हारे लिए अर्पित है, हम किसी भी प्रकार तुम्हारे मर्म स्थल को चोट न पहुँचाएं।"

अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह मंत्र बतलाने को काफी है किसान और राष्ट्र के बीच माँ और पुत्र का संबध था।...
वैदिक काल में किसान और देश के बीच जो संबंध था उसे आज भी परम्पराओं में ढूँढ़ा जा सकता है –

उत्तर भारत का किसान हल चलाने से पहले वह धरती से प्रार्थना करता है कि हे माँ, तुम्हारे उपर मैं हल चला रहा हूँ, इसके लिए मुझे क्षमा करना।
.... तो वही हमारे बिहार के किसान फसल रोपने से पहले अपने खेत में स्थित भंडार कोने (उत्तर-पश्चिम दिशा) में धरती देवी को पूजा करता है।

किसानों के राष्ट्रप्रेमी होने के कारण ही इस राष्ट्र के निवासियों ने उनकों जी-भर के मान-सम्मान दिया है।
यह मान-सम्मान वैदिक काल से ही चला आ रहा है, जिसे वेद के कृषि सूक्त का यह दो मंत्र पूष्टि कर रहा है – अन्नाना पतये नमः क्षेत्राणां पतये नमः। 

यजुर्वेद का यह मंत्र किसानों को अन्नपति कहकर स्तुति कर रहा है... तो अथर्ववेद का यह मंत्र कह रहा है "ते कृषि च सस्यं मनुष्या उपजिवन्ती" अर्थात् जो खेती करते हैं वह सफल जीवन जी रहे हैं।

कृषि सूक्त का एक और मंत्र – यद् यामम् चक्रु: अन्नविद: अर्थात् जो खेती करते हैं उन्हे अन्नविद कहा जाता था।

वैदिक काल में किसानों को अन्नविद और अन्नपति कहकर जो सम्मान दिया जाता है वह आज भी "अन्नदाता" के रुप में जारी है। 

प्राचीन काल से चली आ रही एक परम्परा की ओर भी ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा – 
भोजन शुरु करने से पहले अन्नपूर्णा देवी को प्रणाम करने और भोजन समाप्त करने के बाद – "अन्नदाता  सुखी भव" कहने की इस देश की परम्परा रही है।

किसान शूरू से ही देशप्रेमी रहे इसी कारण किसानों को जी-भर मान सम्मान मिला।

वैदिककाल का किसान कहता था – अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्।
अभिषाडस्मि विश्वाषाडाशामशां विषासहि। 
अर्थात् – अपनी इस मातृभूमि पर मैं विरोधी शक्तियों का पराभव करनेवाला हूँ, प्रशंसनीय कीर्ति वाला हूँ, सब ओर से सब विरोधी शक्तियों को नष्ट करने वाला हूँ। 

वैदिक काल का किसान एक ओर अन्नपति था तो दूसरी ओर देश का सैनिक भी था... 
वहीं कुछ धूर्त किसानों के वेश में देश विभाजन के  नारें और गीत गा रहें है।
उन्हें यह तो पता होना चाहिए कि जो इस धरती को तिरस्कार करता है  वह जीवन भर तिरस्कृत जीवन जीता है क्योंकि यह राष्ट्र अनादि काल से ही राष्ट्रप्रेमियों का रहा है।।
✍🏻Sanjeet Singh जी की पोस्ट

कृषि का क्या होगा?
~~~~~~~~~~~~~~~

जैसे ही 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा हुई थी, पक्ष और विपक्ष दोनों फ़ौरन आमने-सामने आ गए। एक को समर्थन करना था तो दूसरे को विरोध। अब ये तो सबको पता ही है कि भारत पर समाजवाद ढोने की संवैधानिक मजबूरी है। ये समाजवाद वो राजनैतिक व्यवस्था है जिसके तहत कार चलाने के लिए सड़कें तो बन जाती हैं, लेकिन पैदल के चलने के लिए फूटपाथ कभी बनेगा भी या नहीं, इसकी कोई गारन्टी नहीं होती। जाहिर है ऐसी व्यवस्था में काम कर रहे राजनेताओं को पता था कि इस पैकेज में गरीबों को क्या मिलेगा, ये एक बड़ा सवाल हो सकता है। संभवतः हाल के पांच-छह वर्षों में बदलती व्यवस्था से उन्हें (और उनके टुकड़ों पर पलने वालों को) खासी निराशा हुई होगी।

कहने को भारत एक कृषि प्रधान देश है लेकिन यहाँ भी परिभाषाएँ स्पष्ट नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर एक कपास उपजाने वाले और एक गेहूं उपजाने वाले में जमीन आसमान का फर्क होता है। सब्जियां उपजाने वाले की जरूरतें मक्के की खेती करने वाले से बिलकुल भिन्न हैं। अफ़सोस कि “वन साइज़ फिट्स आल” की नेहरु युग वाले समाजवाद की नीतियों में किसान का मतलब “अन्नदाता” बनाकर उसके नाम पर बस भावनाओं का दोहन किया गया है। जब कपास और गन्ने जैसी फसलों का जिक्र कर दिया है तो संभवतः कुछ लोगों को अंतर का अंदाजा भी हो गया होगा। कपास और गन्ने जैसी फसलें बेचने के उद्देश्य से उपजाई जाती हैं।

इनके किसानों को क्या आप अन्नदाता कहेंगे? नहीं, मूलतः ये व्यापारी है। ये जो फसलें उपजाते हैं, उसमें भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा कपास और गन्ने के फसल को सीधा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे लम्बे प्रसंस्करण की जरूरत होगी। अब अगर समस्याओं के तौर पर देखें तो गन्ने की फसल जहाँ होती है, वहीँ एक बड़ी लागत से तैयार हुआ चीनी मिल भी चाहिए। अगर मिल दूर है तो वहां तक फसल ले जाने में गन्ना सूखेगा और किसान को कम मूल्य मिलेगा। अगर बिहार में ज्यादा मिल हों भी तो मिल चलाने वाले को कम मुनाफा होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि चीनी मिल से संशोधन के बाद ही रम, बियर जैसी कई किस्म की शराब बनती। अब जब बिहार में ये प्रतिबंधित है तो कोई यहाँ चीनी मिल क्यों लगाएगा? उद्योगपति को कुत्ते ने तो काटा नहीं है जो अपना नुकसान करवाए!

यानि ऐसे कैश क्रॉप, नकदी फसल उगाने वाले को बिहार में खेती करने का कोई फायदा नहीं। ये उस किस्म की खेती होती जिसमें जमीन का मालिक पूँजी लगाता है और मजदूरों के जरिये काम होता है। अगर ऐसी फसलें नहीं हैं तो इसका मतलब है कि खेती से बहुत कम रोजगार पैदा हो रहा है। गेहूं-धान का खेत ज्यादा लोगों को रोजगार नहीं देता। अगर सब्जियों का मामला देखें, तो वो इससे बहुत अलग हो जाएगा। आलू-प्याज जैसी चीज़ों के लिए कोल्ड-स्टोरेज की जरुरत होगी। ताज़ी सब्जियों को प्रसंस्करण के अलावा किसी और तरीके से बचाकर नहीं रख सकते। टमाटर है तो उसका एकमात्र विकल्प प्यूरी-सॉस बनाना होगा। परवल-भिन्डी जैसी चीज़ों के साथ ऐसा कुछ हो सकता हो, तो संभवतः ये शोध का विषय ही होगा।

अब यहाँ जो बदलाव चाहिए थे वो थे प्रसंस्करण के बाद भी आप कितना जमा कर सकते हैं? लाइसेंस-परमिट राज के दौर में समाजवादी हित में बने, पचास साल पुराने नियम कायदों में एक “एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट” भी होता था। इसके तहत खाने की कई चीज़ों को जमा करने पर “जमाखोरी” के जुर्म में आपको जेल में डाला जा सकता था। जाहिर है इन्हें जमा करने का जोखिम आम kisan तो नहीं लेता। इनमें दालें, खाने का तेल, सरसों जैसे बीज जिनसे तेल निकाला जा सकता हो, ये सब तो शामिल थे ही, इनके साथ-साथ इसमें आलू और प्याज भी आते थे। यानी ये चीज़ें जरूरत के वक्त के लिए जमा नहीं होती। जैसे ही थोड़ी भी कमी हुई, फ़ौरन लाइसेंस-परमिट धारक व्यापारी (जो खुद को कागजों के हिसाब से कृषि उत्पादों की बिक्री करने के कारण किसान घोषित करके टैक्स भी नहीं देता था), इन चीज़ों के दाम बढ़ा सकता था।

संभवतः अब आपको अंदाजा हो गया होगा कि महाराष्ट्र के किसी भूतपूर्व कांग्रेसी नेता की नेत्री पुत्री भी कैसे कृषि से करोड़ों की आय कर पाती हैं और आम किसान जिसे असल में “अन्नदाता” कहा जाना चाहिए था, वो उसी महाराष्ट्र में आत्महत्या करता रहता है। अपने आप को “अन्नदाता” घोषित किये बैठे इन व्यापारियों को उस समय अफ़सोस हुआ होगा जब सरकार बहादुर ने खाने-पीने की चीज़ें, जैसे दाल, तेल, आलू-प्याज जैसी चीज़ों को “एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट” से बाहर कर देने का फैसला किया है। कानून बदल रहा है और आगे इन चीज़ों को कितनी मात्रा में जमा किया जा सकता है, वो लाइसेंस परमिट से मुक्त होगा। इसके साथ ही एक लाख करोड़ को कृषि सम्बंधित इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे कोल्ड स्टोर और फसल काटने के बाद की जरूरतों में निवेश किया जाएगा। इससे कई इलाकों में बदलाव आएगा।

बाकी कृषि सम्बन्धी फैसले और भी हैं लेकिन उसपर कितने लोगों की रूचि होगी ये मालूम नहीं। इसलिए फ़िलहाल यहीं रुकते हैं, आगे फिर कभी! जय राम जी की!
✍🏻आनन्द कुमार

कुबुद्धिधारी और कुतर्की इकोनॉमिस्ट APMC मॉडल की बिहार में हटाये जाने को लेकर तर्क देते है कि इससे बिहार का किसान हानि में है। बिहार को हर चीज खास करके नेगेटिव कहानी के लिए पोस्टर बॉय के रूप में इस्तेमाल करने की यह कहानी बौद्धिक रूप से बेईमानी और तथ्यात्मक रूप से गलत है।

2005-15 के बीच, बिहार की कृषि विकास दर 3.6% के राष्ट्रीय औसत की तुलना में 4.7% थी। 2015 से, भारत का कृषि विकास 2% रहा है, बिहार 7% है!

दुर्भाग्य से, कृषि को परिभाषित करने के लिए केवल गेहूं और चावल का उपयोग करने वाले एक सरलीकृत तरीके का उपयोग किया जाता है। बिहार सब्जियों का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक और भारत में फलों का आठवां सबसे बड़ा उत्पादक है!

2015 -21 के बीच BIHAR का सकल घरेलू उत्पाद 13.17%, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

पंजाब कृषि विकास दर हासिल करने के लिए क्या करना है, इसका मानदंड नहीं है। 2005 से 2020 का कृषि विकास दर इंटरनेट पर उपलब्ध है। पंजाब और दूसरे राज्यों की तुलना कर लें फिर बताये की कृषि विकास दर में कौन कहां है। 

मैं तो कहता हूँ कि सिंचाई और बिजली जैसी समस्याओं के बावजूद बिहार में कृषि विकास दर सराहनीय है। सही मायने में APMC तभी तक सफल है जब सरकार सहयोगी हो लेकिन कृषि उत्पाद की खरीद की एक सीमा होती है और सरकार के हाथ बंधे है। भारत के किसी भी राज्य में रआज्य सरकारों के द्वारा पूर्ण कृषि उत्पाद का खरीद नही किया जा रहा है ना किया जा सकता है। 

यह आंदोलन निहायत ही ब्लैकमेलिंग है खास करके जब आप देखते है कि सरकार बदलाव लाने के लिए तैयार है। पंजाब के किसानों को यह हठी व्यवहार छोड़ना चाहिय।

 बाकी विपक्ष पर क्या कहें जिस समय वे विपक्ष है उनका काम है मौके का फायदा उठाना।
✍🏻ठाकुर गुंजन सिंह

गुड़ से समझें इस किसान आंदोलन को..
.....
यह जो हम गुड़ खाते हैं, इसका अधिकतम भाग यदि अपन कहें कि  किसानों के बीच "आपसी अविश्वास" का फल है! तो आपको अजीब सा लगेगा।

वो क्या है, किसानों के जारी आंदोलन में बहुसंख्य किसान "भूस्वामी किसान" हैं और इनके पीछे आढ़ती। लेकिन इस कथित किसान आंदोलन में "अधिया या बंटाईदारों" का प्रतिनिधित्व और आवाज शून्य है। जो करीब दो-तिहाई वास्तविक किसान है। लेकिन इनका कोई रिकार्ड नहीं है, क्योंकि इनको किसी तरह का कानूनी संरक्षण नहीं है। ना बंटाईदारों की कोई कानूनी या संवैधानिक परिभाषा है, इस वजह से इनका कोई रिकार्ड नहीं है।

वो जो शुरुआत में "गुड़" का उदाहरण दिया...उससे समझिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा में वास्तविक किसान ना के बराबर हैं। इन इलाकों में एक एकड़ का किराया 30 से 50 हजार वार्षिक है।  ज्यादातर खेती बाहरी लोग आकर करते हैं। बौद्धिक लोग इसे sub tenency या दूरवर्ती किसान बोलते हैं।

गुड़ की बात को आगे बढ़ा रहा हूँ। जो दूरवर्ती किसान गन्ने की खेती बंटाई या अधिया पर लेता है, वो अपना गन्ना, गन्ना मिल को नहीं देना चाहता। क्योंकि मिल से गन्ने का मूल्य किसान खाते में आता है, यानी भूस्वामी के खाते में। ऐसे में बंटाईदार को अपने श्रम के मूल्य को पाने के लिए भूस्वामी के पीछे भागने की बजाय उत्पाद का मूल्य खुद साधना पसन्द करता है। ताकि जो भी लाभ-हानि हो, उस पर उसका नियंत्रण तो रहे। इस वजह से गुड़ बनाता है। 

मुजफ्फरनगर के चरथावल कस्बे की पड़ताल की तो पता चला मुश्किल से बीस साल पहले तक कस्बे में 300 से 400 कोल्हू थे, आज कठिनाई से दस से बारह मिलेंगे।
 
बीस-तीस साल पहले वास्तविक भू स्वामी या उनके परिवार स्वंय गुड़ बनाते थे, आज Absentee landlordism की संख्या ज्यादा हो गई। यानी वो किसान जो जमीन किराए पर देते हैं, खुद चंडीगढ़,मेरठ, मुंबई या दिल्ली में रहते हैं। गन्ने के खरीदार अब मिल मालिक हो गए हैं। सरकार गारंटर बन गई। एक तरह से समाज की जरूरत नहीं रही। कुल मिला कर देखें, अधिकतर राज्यों ने अपने हित में खेती-किसानी MSP नीति बनवाई। ना कि बंटाईदारों के हित में। बंटाईदारों को तो आज तक "कानूनी परिचय" तक नहीं मिला। 

इससे समाज का आपसी विश्वास खत्म सा हो चुका है।

आज जो भी थोड़े बहुत कोल्हू चल रहे हैं, गुड़ बन रहा है, वो भी बंटाईदारों के खुद के नियंत्रण में चल रहे हैं। बंटाईदार चला रहे हैं। भू स्वामी तो आज शायद ही कोल्हू से गुड़ बनाते मिलें कहीं ! 
बंटाईदार खुद का कोल्हू चलाते हैं, क्योंकि उनको को डर है, यदि मिल को दिया तो पैसा भूस्वामी के खाते में जाएगा। उसके पीछे दौड़ने से अच्छा है खुद गुड़ बनाकर बेच लो। जो कुछ मिले, वही भला।

अब मुद्दा यह है, बंटाईदार के अधिकारों को लेकर जारी किसान आंदोलन में गज्जब का सन्नाटा क्यों है। आपराधिक सन्नाटा। आंदोलन करने वाले किसानों का असल ख़ौफ़ अंबानी-अडानी से नहीं हैं। असल ख़ौफ़ बंटाईदार से हैं। यदि उनको कांट्रैक्ट राइट्स मिल गए तो भू स्वामी की "तानाशाही" का क्या होगा ? यदि बंटाईदारों को "कानूनी संरक्षण" मिल गया तो भू स्वामियों" का क्या होगा ?

बिहार में एक प्रयास हुआ था। बंटाईदारों के "न्यूनतम हित" की रक्षा के लिए "देबू बंधोपाध्याय कमेटी" की सिफारिश के ज़रिए। लेकिन नीतीश की इस कोशिश के खिलाफ बिहार का भूस्वामी प्रचंड विरोध के साथ खड़ा हो गया तो कमेटी को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

कुल मुलाकर मुद्दा यह है, बरतानवी औपनिवेशिक महालवारी, रैयतवारी, स्थायी बंदोबस्त के मॉडल से निकल के भू स्वामी वैश्विक बाजार के लिए तैयार होना चाहते हैं या नहीं ? या फिर सरकारी सड़क या शहरीकरण का इंतजार करेंगे, ताकि खेत बेच परमानेंट पलायन कर सकें ?

लेकिन यह तो तय है, ज्यादातर भूस्वामी अब वास्तविक किसान रहे नहीं। ट्रैक्टर वगैरहा पर चढ़ फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया पर डालने वाले अधिकांश भूस्वामी हैं। वास्तविक किसान नहीं। और बिना "दूरस्थ किसानों, बंटाईदारों" के हितों की कानूनी व्याख्या, कानूनी रक्षा किए बिना भूस्वामी भी इस मकड़जाल से निकलने वाले नहीं। आने वाला भविष्य बंटाईदारों के हाथ है। वो ही वास्तविक "अन्नदाता" हैं। 

बंटाईदारों को स्वीकार करें भू स्वामी। इनको साथ लीजिए। इसी में आपका सुखद भविष्य है। देश का भी।

यह भी तय है,मोदी यदि इन कानून पर अड़े रहे तो उनका निष्ठावान वोट बैंक बनने के लिए विशाल सामाजिक पूंजी प्रतीक्षा कर रही है। 

एक बात और..अपन न कोई ज्ञानी हैं, ना ही कृषि विशेषज्ञ। जो कुछ भी लिखा..वास्तविक समाज में देखा। महसूस किया। वही लिखा। यह भी कह सकते हैं, वामपन्थ ने जो सपने 'केवल" दिखाए। मोदी उन्हें असल जमीन पर उतार रहा है। 
(साभार-✍🏻सुमन्त भट्टाचार्य)

Thursday, December 10, 2020

इंसानियत अभी भी जिंदा है

राजेश कुमार मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल....यह नाम पिछले वर्ष मीडिया में खूब उछला था मीडिया ने भी बहुत अपमान किया था। इनकी यह तस्वीर मन को बहुत सुकून दे रही है..!!

आपको प्रकरण याद होगा कि बरेली विधायक #पप्पू_भरतौल और उनकी बेटी साक्षी मिश्रा का।
विधायक जी की बेटी ने पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर अजितेश नाम के लड़के से शादी कर लिया था।

इस प्रकरण के बाद विधायक जी को मटके में एक अधमरी बेटी मिली जिसे किसी ने मरने के लिए फेंक दिया था। विधायक जी ने उस बिटिया का इलाज करवाया और विधिक रूप से उसे अपनी बिटिया माना और नाम दिया #सीता..!!

ये वही सीता बिटिया है,देखिए कितने सुकून से विधायक जी की गोदी में आराम फरमा रही है।

यह इतनी सुखद और सकारात्मक तस्वीर है जिसको बार बार देखने का मन कर रहा है..!!
एक असीम आनंद और सुकून मिल रहा है इस तस्वीर को देखकर..!!

प्रिन्टमीडिया और सोशल मीडिया के दलालों को और पप्पू भरतौल को बुरा भला कहने वालों को ये चित्र ध्यान से देखना चाहिये। 

बहुत कोशिश करने के बाद भी इस तस्वीर की व्याख्या करने में असमर्थ हूँ कि इस तस्वीर में कितनी भावना,प्यार ,दुलार,विश्वास, सकारात्मकता और कोमलता है ..!!

बस यही कह सकता हूँ कि सुखद है।
सुखद है..!!

Tuesday, November 24, 2020

स्वर्ण मंदिर का सच

यह चित्र 1908 को लिया गया अमृतसर के #हरमंदिर साहब का है जिसे अंग्रेज़ ईसाईयों व वामपंथियों ने गोल्डन टेंपल कहना शुरू किया...
अब यह चित्र देखकर आपके मन में यह प्रश्न उठेगा कि यहां हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे हैं वो भी सिक्ख तीर्थ हर मन्दिर साहब में ?
चलिए तनिक इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं !

सिक्खों के पहले गुरु गुरुनानक थे
2- गुरु अंगददेव
3- गुरु अमरदास
4- गुरु रामदास
5- गुरु अर्जुनदेव
6- गुरु हरगोविंद
7- गुरु हरराय
8 - गुरु हरकिशन
9- गुरु तेगबहादुर
10- गुरु गोविंद सिंह

सभी गुरुओं के नाम में राम, अर्जुन, गोविंद (कृष्ण), हर(महादेव) हैं।

जब औरँगजेब ने कश्मीर के पंडितो को इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा तो कश्मीरी पंडितों ने गुरू तेगबहादुर जी के पास मदद के लिए गुहार लगाई तब गुरु तेगबहादुर जी ने कहा कि जाओ औरंगजेब से कहना यदि हमारे गुरु तेगबहादुर जी यदि मुसलमान बन गए तो हम भी मुसलमान बन जाएंगे, 

ये बात पंडित औरंगजेब तक पहुंचा देते हैं तब औरंगजेब गुरु तेगबहादुर जी को दिल्ली बुलाकर मुसलमान बनने के लिए दवाब डालता है लेकिन गुरु जी द्वारा अस्वीकार करने पर उन्हें यातना देकर मार दिया जाता है।

अब प्रश्न ये है कि यदि सिक्ख हिन्दू से अलग  हैं तो कश्मीरी पंडितों के लिए गुरु तेगबहादुर ने अपने प्राण न्यौछावर क्यों कर दिए ?

गुरु गोविन्द सिंह का प्रिय शिष्य बंदा बहादुर (लक्ष्मण दास) भारद्वाज गोत्र का ब्राम्हण था जिसने गुरु गोविन्द सिंह जी के बाद पंजाब में मुगलों की सेना को नाकों चने चबवा दिए -
कृष्णदत्त जैसे ब्राह्मण ने गुरु के सम्मान के लिए अपने सम्पूर्ण परिवार को कुर्बान कर दिया...

राजा रणजीत सिंह कांगड़ा की ज्वालामुखी देवी के भक्त थे उन्होंने देवी मंदिर का पुर्ननिर्माण कराया....

आज भी अनेक सिक्ख व्यापारियों की दुकानों में गणेश व देवी की मूर्तियां रहती हैं, आज भी सिक्ख नवरात्रि में अपने घरों में जोत जलाते हैं, 
***
अब प्रश्न ये उठता है कि सिक्ख कब, क्यों व कैसे हिन्दुओं से अलग कर दिए गए ?

1857 की क्रांति से डरे ईसाई (अंग्रेज़) ने हिन्दू समाज को तोड़ने की साज़िश रची!
1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया, जिसका केंद्र तत्कालीन पंजाब का लाहौर था। 

स्वामी दयानंद ने ही सबसे पहले स्वराज्य की अवधारणा दी। जब देश का नाम हिंदुस्तान तो ईसाईयों (अंग्रेज़) का राज क्यों!

स्वामी दयानंद के इन विचारों से पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों की बाढ़ आ गयी।

 लाला हरदयाल, लाला लाजपतराय, सोहन सिंह, भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह जैसे क्रांन्तिकारी नेता आर्य समाजी थे।

 अतः ईसाई मिशनरियों(अंग्रेजो) ने अभियान चलाया कि सिक्ख व हिन्दू अलग हैं
 ताकि पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर किया जा सके। इसके लिए कुछ अंग्रेज़ समर्थक सिक्खों ने एक शाजिस के तहत अभियान चलाया कि सिक्ख हिन्दू नही हैं और अलग धर्म का दर्जा देने की मांग की (जैसे हाल ही में कर्नाटक के कुछ ईसाई बने लिंगायत समुदाय के लोगों ने हिन्दू धर्म से अलग करने की मांग उठाई थी) 

ईसाई मिशनरियों(अंग्रेज़) ने 1922 में गुरुद्वारा एक्ट पारित कर सिक्खों को हिन्दूओं से अलग कर उन्हें अलग धर्म का घोषित कर दिया। और आजादी के बाद भी भारत के विखंडन के जिम्मेदार गुलाबी चचा ने इसे बनाये रखा...!

मित्रो, हिन्दू सिक्खों का खून एक है, हर हिन्दू को गुरूद्वारा जाना चाहिए, हर हिंदू को जीवन में एक बार अमृतसर के हरमंदिर साहिब अवश्य जाना चाहिए 🙏🙏🚩

गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 में खालसा (पवित्र) पंथ का गठन किया था और कहा था कि मैं चारों वर्ण के लोगों को सिंह बना दूँगा 🙏🙏

" देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा प्राण देकर ही नही, प्राण लेकर भी की जाती है"
जय हिन्द जय भारत
(साभार-फेसबुक) 

Thursday, September 3, 2020

लाकडाउन के हीरो

 इस मिल मालिक ने नहीं निकाला, अपने,

17500 वर्करों में से किसी एक को भी! के.पी.आर मिल्स के मालिक हैं और अंडरवियर बनियान बनाते हैं। भारत ही नहीं, दुनिया की बड़ी कंपनियां उन से माल बनवाती हैं। तिरुपुर और कोयंबटूर में उनकी 4 फैक्ट्रियां हैं जिनमें 22000 वर्कर काम करते हैं।"

"रामास्वामी ने 17,500 हजार जो माइग्रेंट लेबर थी (4500 लोकल, निकट के अपने घर पर रहे) उसको अपनी फैक्ट्री के ही हॉस्टलों में ठहरने को कह दिया और कहा कि जब तक भी lock-down चलेगा तुम लोग चिंता मत करो, तुम्हारा सारा खाना पीना ठहरना, यहां तक की मोबाइल की चार्जिंग भी मेरी तरफ से फ्री।

रामास्वामी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में बताया "प्रति लेबर ₹13500 मासिक का उसका खर्चा आया और इस नाते से कुल 30 करोड रूपया, लगभग 2 महीने में खर्च हो गया। क्योंकि उसने एक भी आदमी की एक भी दिन की सैलरी भी नहीं काटी।"

जब पूछा "आपने इतना नुकसान क्यों सहन किया?" 

उन्होंने कहा "मैंने दोनों बातें सोची। एक तो यह मेरी नैतिक जिम्मेवारी थी कि मैं इनको बेरोजगार ना करूं, आखिर मुझे इतना बड़ा बनाने में इन्ही लोगों का ही तो हाथ है। फिर मुझे यह भी था की लॉकडाउन के बाद मुझे भी स्किल्ड लेबर नहीं मिलेगी। 

इस कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 3250 करोड़ का है लेकिन बड़ी बात है, केपी रामा स्वामी जी ने लेबर के बारे में उच्च स्तरीय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। भारत ऐसे ही लोगों के सहारे चल रहा है.....

(Copy/Paste)

Saturday, January 6, 2018

पित्र दोष से मुक्ति के उपाय

.दोस्तों आज हम आपको पित्र दोष के बारे में बताने जा रहे है .यानी के पित्र दोष क्या होता है इसके क्या कारण है और इसके आपके जीवन पर क्या क्या प्रभाव हो सकते है और पित्र दोष से मुक्ति के क्या उपाय है .


शास्त्रों के अनुसार कुंडली में यदि नवं भाव ,पंचम भाव और सूर्यतथा गुरु राहू या शनि के द्वारा पीड़ित है चाहे उनकी युक्ति हो या दृष्टि तो यह पित्र दोष की अवस्था कहलाती है .पित्र दोष से परिवार की सुख शान्ति समाप्त हो जाती है .परिवार में मानसिक तथा आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होने लगती है .शास्त्रों में इसके लिए काफी उपाय भी बताये गए है जैसे श्राद्ध पक्ष् में पितरों का श्राद्ध करना ,पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना इत्यादि .दोस्तों यह सब हमारे शास्त्रों के हिसाब से बताये गए नियम है . अब हम लोग आज के धरातल पर आकर आज की परिस्थिति से इसका आकलन करके देखते है के आखिर ये पित्र दोष होता क्या है और इसकी वजह और मूल कारण क्या है.
आज की भागम भाग और दौडधूप भरी जिंदगी में हमारे लिए एक दूसरे के पास समय ही नहीं है यहाँ तक की आदमी सिर्फ भागे जा रहा है और सिर्फ भागे ही जा रहा है पर किसके लिए भाग रहा है यह उस भागने वाले इंसान को भी नहीं पता .आजकल की महंगाई भरी जिंदगी में पति पत्नी सबको ही आजकल नौकरी करनी पड रही है परिवारों का ताना वाना ये है के पहले के समय में एक भरा पूरा परिवार होता था जिसमे दादा दादी चाचा चची भाई भाभी सभी होते थे लेकिन आज .आज घरों में अगर होता है तो सिर्फ पति पत्नी और उनके बच्चे .आजकल की भागम भाग और दौड धूप भरी जिंदगी में हमको रिश्तों से बहुत दूर कर दिया है .


खैर चलिए अब आते है मुद्दे की बात पर .दोस्तों कुदरत का एक नियम है के जिसने लिया है उसको जिससे लिया है उससको वह वापस देना भी पड़ेगा चाहे वो किसी से ली हुई जमीद जायदाद हो या हमारे माता पिता द्वारा की हुई हमारी परवरिश . आजका युवा इन सब बातों को दकियानूसी बाते बताता है लेकिन आज की युवा पीढ़ी ही सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ में दबी बैठी है और यह बोझ है उनके माता पिता की परवरिश का बोझ . आजके लोगों के मतानुसार अगर माता पिता ने उनको पाल पोसकर बड़ा किया है तो उन्होंने कोई एहसान नहीं किया है यह उनका फ़र्ज़ है तो फिर उन माता पिता के बच्चों का भी तो कोई फ़र्ज़ है न अपने माता पिता के प्रति अपनी पूरी जिंदगी की कमी और अपनी पूरी जिंदगी का अनमोल समय देकर माता पिता अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते है और बच्चे,बच्चे बड़ा होकर उनके लिए क्या करते  है ...........बच्चे या तो उन्हें वृधाश्रम में छोड़ आते है या फिर उन्हें किसी अकेले से कमरे में बंद करके चले जाते है या फिर BRAIN HAEMORRHAGE से पीड़ित  अपने माता पिता को छत से नीचे फैंक देते है ..हम लोग इस बात का ध्यान क्यूँ नहीं रखते के आज हम जो अपने माता पिता के साथ गलत व्यवहार कर रहे है कल को हमारे खुद के बच्चे भी बड़े होकर हमारे साथ भी वही व्यवहार करेंगे क्युकी बच्चों के ऊपर किसी दूसरे का प्रभाव बाद में पड़ता है सबसे पहले बच्चे अपने माता पिता का ही अनुसरण करते है .आज हमारे घरों में जो बड़े बुजुर्ग है उन्होंने संस्कार अपने बुजुर्गों से सीखे है और उन्हें उनके संस्कारों पे गर्व है .उन्होंने ऐसे संस्कार देखे है जहाँ पर औरते अपने से बड़ों के सामने पर्दा करके रहती थी .आजकल के लोग इसे एक कुरीति और गलत प्रथा का नाम देते है लेकिन यह औरतों द्वारा अपने माता पिता समान बड़ों को दिया जाने वाला सम्मान था . लेकिन आज के समय में काफी औरतें अपने घरों में बड़े बड़े बुजुर्गों  के सामने घुटनों तक के कच्छे और बदन दिखाऊ टी शर्ट पहनके घूमती है और ऐसी औरतें इसको आधुनिकता का नाम देती है जबकि यह आधुनिकता नहीं यह फूहड़ता है और फूहड़ता और नंगेपन को संस्कारों का नाम नही दिया जा सकता है .इसके लिए औरतों के साथ साथ घर के मर्द भी बराबर रूप से जिम्मेदार है जो के जोरू के पालतू जानवर की तरह उसके गुलाम बनके रहते है .आजकल लगभग हर घर में (ALMOST ७०-८०% ) घरों में पारिवारिक कलह या गंभीर बीमारियों का या बेरोजगारी या दूसरे मामले दिखाई देते है और जब हम उनका कुंडली से विश्लेषण करते है तो इसमें कुंडली में पित्र दोष बताया जाता है .इस दोष के निवारण के लिए हम तरह तरह के यत्न करते है जैसे के बड़ी पूजा पाठ या बड़ा कर्मकांड या फिर और कोई तरीका लेकिन यह सब बेकार की बातें है क्युकी जब हम हमारे जीवित बुजुर्गों का ख्याल नहीं रख सकते ,जब हम हमारे जीवित माँ बाप को अपने साथ अपने घरों पर नहीं रख सकते तो उनके गुजर जाने के बाद इस सब झूठ मूठ की पूजा पाठ और दिखावे और आडम्बर का फायदा क्या . और अगर हम इसके लिए पूजा या कोई अनुष्ठान भी करते है तो वो इसके लिए नहीं के हम अपने बुजुर्गों को सम्मान दे रहे है बल्कि इसलिए करते है ताकि हमारे जीवन में आने वाली समस्याएं ख़त्म हो जाए .मतलब यहाँ भी हम स्वार्थ देख रहे है .सनातन धर्म में गणेश जी का स्थान सर्वोपरि माना गया है क्यों क्युकी उनके लिए उनके माता पिता ही समस्त ब्रम्हांड थे . माता पिता के चरणों में ही सभी देवी देवता निवास करते है हर धर्म में इसे सर्वोपरि माना गया है .माता पिता को भी चाहिए के वो अपनी संतान को सही शिक्षा और सही संस्कार दे . आजकल का युवा अपने घरवालों के साथ रहने की अपेक्षा अपने ससुराल वालों के आचल में छुपकर रहना ज्यादा पसंद करता है .ऊपर वाले की माया भी बड़ी अजीब है उसे पता था के पहले के ज़माने में श्रवन कुमार जैसे बेटे और बहुए होती थी तो पहले बुजुर्ग १०० -१०० साल तक जीते थे लेकिन ऊपर वाले ने जब देखा के कलयुग के राक्षस जैसे बेटे और बहुए उनको मतलब निकल जाने के बाद दर दर की ठोकरे खाने के लिए छोड़ देंगी इसलिए घरों में बुजुर्ग आज वैसे भी ज्यादा समय ताज जीवित नहीं रहते है . जब तक बुजुर्ग कमाते है या जब तक उनका शरीर साथ देता है तभी तक वो जिन्दा रहते है बाद में ऊपर वाला उन्हें किसी न किसी बहाने से अपने पास बुला लेता है .है तो यह कलयुग का ही प्रभाव लेकिन करे क्या . आज हम जो वो रहे है वो हमे भविष्य में काटना ही पड़ेगा .जब हम आज काटे बो रहे है तो आगे जाकर हमे काटे ही तो मिलेंगे .मैं यहाँ आपके साथ एक सच्ची कहानी साझा करना चाहता हूँ . एक घर में एक माँ बीमार होती है .उसके बेटे को हृदाघात की वजह से अस्पताल में दाखिल करना पड़ता है . ६ दिन तक वो व्यक्ति अस्पताल में ही रहता है लेकिन जब अगले दिन जब की उसका ऑपरेशन की सारी तैयारियां चल रही तो उस रात्री को उस व्यक्ति की माँ का देहांत हो जाता है . जब उस व्यक्ति को इस बात का पता चलता है जिसका के अगले दिन ऑपरेशन होना था तो वो व्यक्ति अपना ऑपरेशन कैंसिल करके अपने माँ के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए गाव निकल जाता है .जब डॉ उससे ऑपरेशन ना करके जाने की वजह पूछते है तो वह व्यक्ति कहता है के सर हम जब छोटे छोटे थे तभी हमारे पिता का देहांत हो गया था हमारी माँ ने बहुत ही मेहनत मजदूरी करके हमे इस स्थिति में लाके खड़ा किया .अगर मैं इस समय उसके अंतिम कार्यक्रम में न जा पाऊं तो अगर मैं सही भी हो जाऊं तो इस जीवन का फिर क्या अर्थ .ज्यादा से ज्यादा मेरी मौत ही होगी न इससे ज्यादा तो और कुछ नहीं होगा न .और वो व्यक्ति नहीं माना और चला गया .माँके अंतिम सस्कार वाले दिन के अगले दिन उस व्यक्ति को हृदयाघात आया और अस्पताल ले जाते वक़्त रास्ते में ही उस व्यक्ति की मौत हो गयी .कुदरत के भी खेल देखिये के जहाँ उस व्यक्ति ने शुक्रवार को अपनी माँ का अंतिम संस्कार किया था तो रविवार के दिन उस स्थान के बिलकुल पास में ही उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार उसके परिजनों ने किया .बाकी मेरे इस लेख का उद्देश्य आज की सामजिक व्यवस्था का सही दर्शन कराना है .
बाकी आप सब समझदार है
मेरा देश महान
जय हिन्द

हेमंत कुमार शर्मा 

Saturday, April 22, 2017

HAWAN VIDHYA हवन विधि

आप सभी को हमारा नमस्कार । हम आज आपको यहाँ एक बहुत पुरानी वैदिक परंपरा के बार में बताने जा रहे है । हवन जिसे हम अग्निहोत्र भी कह सकते है ।पहले के जमाने में हर घर में हर रोज हवन होते थे जिससे हमारे वातावरण की शुद्धि के साथ साथ हमारा आध्यात्मिक और वैदिक शुद्धिकरण भी होता था । हवन से निकली हुई धुंआ आसमान में जाकर बादलों के साथ मिल जाती थी जो आगे जाकर वर्षा में सहायक होती थी । हवन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहाँ भी हवन का आयोजन होता है वह पर किसी भी प्रकार का वास्तुदोष नहीं होता और उस परिवार के लोगों पर किसी भी प्रकार का तांत्रिक अभिकर्म नहीं किया जा सकता क्योंकि हवन में हम समस्त देवी देवताओं का आह्वान करते ही जो कि हमारी हर प्रकार से रक्षा करते है । इसलिए गायत्री परिवार वाले  अग्निहोत्र को ज्यादा बढ़ावा देते है ।आज के इस महंगाई के दौर में जब पूजा पाठ भी इतने महंगे हो गए है तो लोग हवन का खर्च भी उठाने में असहज महसूस करते है । इसलिए हम आज आपको दैनिक हवन की सबसे आसान,सस्ती लघु और असरकारक विधि बताने जा रहे है । आप सभी से निवेदन है कि कृपया आज से ही हर घर का कोई भी एक सदस्य हर रोज घर में दैनिक हवन करे जिससे इस हवन का प्रभाव उस घर के प्रत्येक  सदस्य को मिल सके । इस दैनिक हवन में आपको ज्यादा खर्च करने की भी आवस्यकता नहीं है ।

 दैनिक हवन मे सबसे पहले अग्नि प्रज्वलित करे । किसी लकड़ी( लकड़ी पीपल की या आम की बरगद के ले तो उत्तम रहेगा) पर या गाय के कंडे पर अग्नि प्रज्वलित करे । किसी छोटे से पात्र मे भी  गाय के कंडे पर या लकडी पर अग्नि प्रज्वलित कर सकते है ।पात्र तांबे का या पीतल का या मिट्टी का होना चाहिए । लोहे के पात्र का उपयोग हवन के लिए नही करना है । नीचे लिखी आहूतिया केवल घी से देनी है । आहूति देने के बाद आहूति देने के चम्मच मे बचा हुआ घी इदं न मम के उच्चारण के साथ पास मे रखे पानी के पात्र मे टपकाते जाऐ ।


चार घी की आहुतियाँ
इस मन्त्र से वेदी के उत्तर भाग में जलती हुई समिधा पर आहुति देवें।
1) ओम् प्रजापतये स्वाहा | इदं प्रजापतये - इदं न मम।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक प्रजा अर्थात सब जगत के पालक, स्वामी, परमात्मा के लिए मैं त्यागभाव से यह आहुति देता हूँ।अथवा, प्रजापति सूर्य के लिए यह आहुति प्रदान करता हूँ

2)ओम् इन्द्राय स्वाहा | इदं इन्द्राय - इदं न मम।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक परमऐश्वर्य-सम्पन्न तथा उसके दाता परमेश्वर के लिए मैं यह आहुति प्रदान करता हूँ।अथवा ऐश्वयर्शाली, शक्तिशाली वायु व विद्युत के लिए यह आहुति प्रदान करता हूँ।

3)ओम् अग्नये स्वाहा | इदमग्नये - इदं न मम।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक प्रकाशस्वरूप दोषनाशक परमात्मा के लिए मैं त्यागभावना से धृत की हवि देता हूँ।यह आहुति अग्निस्वरूप परमात्मा के लिए है, यह मेरी नहीं है।अथवा, यज्ञाग्नि के लिए यह आहुति प्रदान करता हूँ।

4)ओम् सोमाय स्वाहा | इदं सोमाय - इदं न मम।।
मन्त्रार्थ- सर्वरक्षक, शांति -सुख-स्वरूप और इनके दाता परमात्मा के लिए त्यागभावना से धृत की आहुति देता हूँ ।अथवा, आनन्दप्रद चन्द्रमा के लिए यह आहुति प्रदान करता हूँ।

5) ॐ गं गणपतये स्वाहा । इदं गणपतये इदं न मम ।

इसके बाद आप जो भी और जितनी भी चाहे आहूति दे सकते है । जैसे गणपति जी की या गायत्री जी की या अपने ईषट की ।

उसके बाद अंतिम आहूतिया इस प्रकार देनी है ।
6) ॐ भूः स्वाहा । इदं अगनेय इदं न मम ।
7) ॐ भुवः स्वाहा: । इदं वायवे इदं न मम ।
8) ॐ स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय इदं न मम ।
9) ॐ भूर्भुवः स्वाहा। इदं न मम ।
10) ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये इदं न मम ।

इस प्रकार आप घर मे दैनिक लघू हवन का आयोजन कर सकते हो । आज के समय मे प्रत्येक हिन्दू के घर मे दैनिक लघू हवन का आयोजन होना चाहिए ।आप सभी से निवेदन है कि आप इस सन्देश को अधिक से अधिक हिंदुओं तक पहुचाये ।
अग्निहोत्र के बारे में अधिक जानकारी के लिए संपर्क कर सकते है ।
धन्यवाद
पं नलिन शर्मा
Mob No :- 09179271166
हेमन्त शर्मा :- 08460205797
उज्जैन